आखिरकार मां चली गयी.....
आखिरकार मां चली गयी, अपनी अंतिम यात्रा पर भगवान के पास बिना हमे परेशान किये। इससे पहले उनकी आदत बहुत खराब थी, सबको परेशान करती थी, शुरू से आखिर से पहले तक। शुरू से बोले तो शुरू से जब से मेरी स्मृतियां संजोने की क्षमता का विकास हुआ तब से। मुझे याद है दूसरी क्लास की वो बात जब में किसी बात पे रूठ के बिना दूध पिये स्कूल चला जाता था वो पीछे पीछे स्कूल में आ जाती थी और क्लास टीचर को बोल के मुझे बाहर बुला के लाड लडा के, पुचकार के परेशान करके दूध पिलाती। ऐसे कोई करता हैं भला, मेने तो कभी न तो देखा और न सुना कि कोई दादी पोते के लिये दूध का गिलास लिए स्कूल आ जाये, तो ये परेशान करना ही हुआ।
ये तो स्कूल पहुंच कर परेशान करने की घटना है तो सोचो वो घर पर कितना परेशान करती होगी। सुबह सुबह ही शुरू हो जाती नींद से उठाने के टाइम पे मेरे बिस्तर पे आके कानूड़ा लाल उठ जा करके मेरे बिस्तर पे ही कृष्ण भगवान के भजन गाने लगती, उफ जो बन्दा यानी में पापा की लातों से नही उठता था उनके भजनों से उठ जाता। और ये सिलसिला अगर बचपन मे ही खत्म हो जाता तो भी चलो कोई बात नही मगर ये तो अनवरत चलता ही रहा, जब जब में घर पे थोड़ा लेट तक सोया तो मां ने ही आके उठाया, तो परेशान ही तो करती थी वो।
खाना खिलाने को तो बहुत परेशान करती थी, कोई बहाना नही चलने देती। हर सब्जी हर वो चीज खिलाती जो रसोई में बनती। जिस चीज का रंग पसन्द नही आता तो उसके स्वाद के गुणगान करके खिला देती जिसका स्वाद पसन्द नही आता उसके रंग रूप की तारीफ करके खिला देती। आते पूछती खाना खाया क्या, जाते पूछती खाना खाया क्या, इतना परेशान करती थी।
ऐसे ही वो हम सबको बहुत परेशान करती थी, जब तक उनमें काम करने की क्षमता थी तब तक किसी को किसी काम के लिए न करते मेने नही देखा, उल्टे वो लोगो को इतना परेशान करती थी कि किसी को बिना बताए उनका काम कर देती और वो बेचारा परेशान हो जाता कि मेरा काम किसने किया।
पिछले कई साल से हरियाणा में काम के सिलसिले में रहते हुए हर महीना घर जाता था तो कई बार 2-4 दिन ऊपर नीचे हो जाता तो मां को तारीख देखना नही आने और 100 के नजदीक उम्र पहुंचने पर उनकी याददाश्त कमजोर हो जाने के बावजूद बोलती, अबकी मोड़ो (देर से) आयो। अबकी बार होली के बाद मार्च के दूसरे हफ्ते के अंत मे जब में आया तो मार्च के अंतिम सप्ताह में ही लॉकडाउन शुरू हो जाने के बाद में हिसार में फंस गया और अप्रैल में एक महीना पूरा होने के बाद भी बीकानेर नही जा पाया। 26 अप्रैल आखातीज को खबर आई कि मां चली गईं, बिना बताए बिना परेशान करे।
जाना तो हम सबको है तो उनको भी था। सहसा विश्वास नही हुआ क्योंकि जो हमारा इंतजार करती थी, इंतजार कर करके हमे परेशान करती थी वो बिना बताए बिना इंतजार किये बिना परेशान किये सोते सोते चली गयी। कभी लगता है इस बार मेने उनको ज्यादा इंतजार करवाया इसलिये चली गयी, कभी लगता है, हमारे मन मे ये आ गया कि वो हमें बहुत परेशान करती है इसलिये बिना परेशान किये चली गयी।
शायद इसलिए माँ चली गयी........😔
"जय गणेशी ओर्गेनाइजर फाउंडेशन"
की प्रेरणा, प्रातःस्मरणीय,
"आदरणीय गणेशी देवी",
सबकी प्यारी,
हमारी दादीजी
को उनकी पुण्यतिथि आखातीज पर अश्रुपूरित श्रद्धांजलि।
🙏😔🙏